मंगलवार, 8 अगस्त 2017

पूजा के फूल-लघुकथा

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पूजा के फूल
''माँ, मैंने पूजा के पास फूल रख दिए हैं,''यह ऋषभ की आवाज थी|
''मम्मी जी, जल्दी उठिए, चाय के लिए पानी चढ़ा दिया है चुल्हे पर, आपके कपड़े भी बाथरूम में रख दिए हैं,''यह बहु रीमा कह रही थी|
''अच्छा बाबा उठती हूँ, बहु, जरा पैर तो दबा दे पहले| और हाँ, तेरे पापा जी को मूली के पराठे पसन्द हैं| जरा मूली कस के रख दीजो|''
''ठीक है मम्मी जी,'' बहु गुनगुनाती हुई काम में व्यस्त थी|
कामिनी जी ध्यान से सुनने की कोशिश करने लगीं|
''मैं तो भूल चली बाबुल का देस....सासू जी मेरी हैं ममता की मूरत'' यह सुनते हुए कामिनी जी के चेहरे पर मुस्कान तैर गई|
कामिनी जी को जगाने के लिए उनके पति सुरेश बाबू कमरे में आए तो पत्नी के चेहरे पर मधुर स्मित देखा| समझ गए स्वप्न देख रही|
''कामिनी, चाय लाया हूँ''
''आपने चाय क्यूँ बनाई, बहु है न घर को स़भाल लेगी| बिल्कुल अपना घर समझती है इसे,'' उनींदे स्वर में कामिनी जी ने कहा|
''नींद से जगो कामिनी| ऋषभ का फोन आया था|''
''अच्छा, भारत आ रहा है न मेरा सपूत और रीमा से क्या बात हुई|दोनो आएँगे तो हमारी खूब सेवा करेंगे जी '' कामिनी जी बोले जा रही थीं|
सुरेश बाबू से यह बोलते न बना कि ऋषभ ने विदेश में ही रहने का फैसला कर लिया है|
--ऋता शेखर 'मधु'

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (09-08-2017) को "वृक्षारोपण कीजिए" (चर्चा अंक 2691) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. अगली पीढ़ी से इतनी आशाएँ न बाँधें लोग,न उन पर निर्भर हों-अपने ढंग से जियें.

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