गुरुवार, 30 नवंबर 2017

जिंदगी में हर किसी को है किसी का इन्तिज़ार

इन्तिज़ार

सर्वशक्तिमान को है बंदगी का इन्तिज़ार
जिंदगी में हर किसी को है किसी का इन्तिज़ार

लाद कर किताब पीठ पर थके हैं नौनिहाल
'वो प्रथम आए', विकल है अंजनी का इन्तिज़ार

पढ़ लिए हैं लिख लिए हैं ज्ञान भी वे पा लिए हैं
अब उन्हें है व्यग्रता से नौकरी का इन्तिज़ार

बूँद स्वाति की मिले, समुद्र को लगी ये आस
तलछटी के सीप को है मंजरी का इन्तिज़ार

ब़ाग़वाँ को त्याग कर विदेश को जो चल दिये हैं
निर्दयी वो भूल जाते भारती का इन्तिज़ार

--ऋता शेखर 'मधु'

बुधवार, 22 नवंबर 2017

रास्तों को ग़र्द से पहचान लेती मुफ़लिसी

ग़ज़ल

बेबसी की ज़िन्दगी से ज्ञान लेती मुफ़लिसी
मुश्किलों से जीतने की ठान लेती मुफ़लिसी


आसमाँ के धुंध में अनजान सारे पथ हुए
रास्तों को ग़र्द से पहचान लेती मुफ़लिसी

बारिशों में भीगते वो सर्दियों में काँपते
माहताबी उल्फ़तों का दान लेती मुफ़लिसी

भूख की ज्वाला बढ़ी तब पेट पकड़े सो गए
घ्राण से ही रोटियों का पान लेती मुफ़लिसी

धूप को सिर पर लिए जो ईंट गारा ढो रहे
वो ख़ुदा के हैं क़रीबी मान लेती मुफ़लिसी

ठोकरों से भी बिखर कर धूल जो बनते नहीं
पर्वतों से स्वाभिमानी शान लेती मुफ़लिसी

यह ख़ला है ख़ूबसूरत बरक़तें होती जहाँ
गुलशनों में शोख़ सी मुस्कान लेती मुफ़लिसी

-ऋता शेखर ‘मधु’

बुधवार, 15 नवंबर 2017

मन में जले जो दीप अक़ीदत का दोस्तो


नभ अब्र से भरा हो निहाँ चाँदनी रहे
तब जुगनुओं से ही यहाँ शबगर्दगी रहे

मन में जले जो दीप अक़ीदत का दोस्तो
उनके घरों में फिर न कभी तीरगी रहे

कटते रहे शजर और बनते रहे मकाँ
हर ही तरफ धुआँ है कहाँ आदमी रहे

आकाश में बची हुई बूँदें धनक बनीं
हमदर्द जो हों लफ़्ज़ तो यह ज़िन्दगी रहे

हर उलझनों के बाद भी ये ज़िन्दगी चली
बचपन के जैसा मन में सदा ताज़गी रहे

*गिरह
भायी नहीं हमें तो कभी चापलूसियाँ
मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे(ज़नाब निदा फ़ाज़ली)

-ऋता शेखर ‘मधु’
अब्र-बादल
निहाँ- छुपी रही
शबगर्दगी-रात की पहरेदारी

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

बचपन के जैसा फिर यहाँ मंजर नहीं देखा

बचपन के जैसा फिर यहाँ मंजर नहीं देखा
गोदी हो जैसे माँ की, वो बिस्तर नहीं देखा

हिन्दू या मुसलमान में आदम यहाँ उलझे
हों सिर्फ़ जो इंसान वो लश्कर नहीं देखा

धरती पे लकीरें हैं दिलों में हैं दरारें
काटे जो समंदर वही नश्तर नहीं देखा

बिखरे जो कभी गुल तो, रहे साथ में ख़ुशबू
जो तोड़ दे जज़्बात वो पत्थर नहीं देखा

शीरीं हो ज़ुबाँ और मुहब्बत की अदब हो
संसार में उसको किसी का डर नहीं देखा
-ऋता शेखर ‘मधु’